Sunday, June 2, 2013

जिंदगी (कविता)



जिंदगी धूप है, बरसात भी,
जिंदगी आस है और प्यास भी,
जिंदगी थिरकन है, धड़कन भी है,
जिंदगी खोज है, एहसास भी.

जिंदगी बिक रही सुबहोशाम,
जिंदगी है बड़ी अनमोल भी,
जिंदगी एक ऐसी चीज़ है,
बेकार भी, बेजार भी, बेमिसाल भी.

जिंदगी तुझसे क्यों गिला करूँ,
जो तू नहीं कुछ भी तो नहीं,
जिंदगी हँसते चितवन की चमक,
जिंदगी खूबसूरत ख्वाब भी.

जिंदगी है मेरा तुझको सलाम,
जिंदगी प्यार भी तकरार भी,
जिंदगी जी सकूँ खुल के यहाँ,
रह जाती है बस याद ही.

अमिताभ

6 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  2. Beautiful poem on Jindagi, but what I want to comment is its counterpart, the Mratue, which I believe is equally relevant because Mratue is the one that makes people do what they do. Imagine you get to live forever, it means there exists a material that can live forever. You can use that material to build things around you. You do not need to eat or drink or do any creative work since you and things around you will last forever anyway. Basically, you become just like a stone. It is the Mratue that pushes people to achieve what they achieve in their limited existence. Hence, there is a symbiotic relationship between Jindagi and Mratue. You look at them separately and you suffer.

    ReplyDelete
  3. आपकी यह रचना कल शनिवार (08-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    ReplyDelete
  4. हाँ है तो यही सब कुछ, पर जिसके पल्ले इसका जो हिस्सा पड़ जाय - बाद में भले ही खींचा-तानी करते रहो !

    ReplyDelete
  5. वाह ...बहुत सुन्दर रचना ....फुर्सत के पल मेरे यहाँ भी पधारे

    ReplyDelete