Saturday, June 28, 2014

High Court Judge

High Court Judge

We all know that the Supreme Court and High Court Judges are very important constitutional authorities in India who enjoy a very superior, important and pivotal position in the affairs of the State. We also know that they enjoy immense power and authority bestowed to them through Constitution and the various other legal provisions.

It is well known that the High Court and Supreme Court Judges are selected through a process which is widely known as the Collegium system. Here the names for High Court Judges are recommended by the Chief Justice of the concerned High Court, who along with a few of his senior colleagues, recommends the names which go through a process where the further scrutiny of names are made by another Collegium consisting of the Chief Justice of India and other senior Judges of the Supreme Court. Names for Supreme Court Judges are initiated directly by the superior Collegium consisting of the CJI and senior Supreme Court Judges.

Without going into the merit and/or demerit of the system, I would like to quote two examples which would make it pretty obvious how a very large section of society possibly perceives this present selection process.

A few months ago I was posted with an IPS officer, slightly senior to me in the seniority ladder, whose son was doing the 5 year L Lb course from a prestigious law institution. One day when we were discussing his son’s career, he said that he was thinking of inducing his son to the practice side instead of joining a law firm. The reason he gave was that if the son remain in practice side, he would definitely ensure the young man’s elevation to the High Court considering his personal clout and the contacts he has with people in power. This IPS officer was pretty sure that his numerous powerful contacts would easily ensure a High Court birth to his son because in his opinion, most other elevations were made in the same manner, where the only thing counted was contacts at the right place, which he thought he also had plenty in number.

As a second example a day before yesterday, an old friend who is the publisher and editor of a medium size Hindi daily came to our house. During discussion the issue of his younger daughter’s career cropped up. He said that he was thinking of sending his daughter to law stream. The reason given was that since his daughter would have an advantage of being a Shia Muslim, along with being a woman, it would not be difficult for him to use his immense contacts and professional clout to get her appointed as a High Court Judge.

These two examples only go to prove that whatever resistance might be there from with the judiciary to any proposed change to Collegium system, the general perception possibly is that anyone with contacts can manage to get appointed to the High Court. If this perception were not so widely prevailing, an IPS officer and a senior editor would not have so casually and so seriously said so. I can say with full authority that they dare not say or think the same about making their child an IAS or IPS officer or sending to IIM or IITs because they think that the procedure is such that does not allow extraneous push and pull and nepotism.

As the principle of natural justice says, justice shall not only be done, it shall seem to be done. In the same manner, possibly a very strong element of transparency in appointment system needs to be made in the higher posts of judiciary, where everyone knows why Mr A or Mr B actually got appointed to High Court or Supreme Court and why Mr C,D, E and the rest got eliminated. As long as this situation of transparency is not achieved, every second influential person in the society will go on thinking and spreading the canard that he can get his son or daughter appointed to the High Court, as if this is the easiest job available in the market.

हाई कोर्ट जज

हाई कोर्ट जज

हम सभी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ओर हाई कोर्ट के जज इस देश की अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं हैं जो देश की व्यवस्था और तंत्र में बहुत श्रेष्ठ, महत्वपूर्ण और निर्णायक स्थान रखते हैं. हम यह भी जानते हैं कि संविधान तथा विभिन्न अन्य कानूनों के अंतर्गत उन्हें बहुत अधिक शक्तियां और अधिकार दी गयी हैं.

यह बात भी सभी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज एक निश्चित व्यवस्था द्वारा चुने जाते हैं जिसे कोलेजियम सिस्टम कहते हैं. यहाँ हाई कोर्ट जजों के लिए नाम सबसे पहले सम्बंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा भेजे जाते हैं जो अपने कुछ वरिष्ठ सहयोगियों के साथ मिल कर नाम चयनित करते हैं जो एक प्रक्रिया से गुजरते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के कुछ अन्य वरिष्ठतम जजों के कोलेजियम द्वारा विचार करने के बाद आगे बढाए जाते हैं जिन पर नियुक्ति की जाती है. सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए भारत के मुख्या न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति नाम पर विचार कर उसे आगे बढाते हैं.

इस व्यवस्था की अछे और बुराई पर कोई टीका-टिप्पणी करने की जगह मैं दो ऐसे उदाहरण रखना चाहूँगा जो यह स्वतः स्पष्ट कर देगा कि इस चयन प्रक्रिया के प्रति आम जनभावना क्या है.

कुछ महीने पूर्व मैं अपने से कुछ साल सीनियर एक आईपीएस अफसर के साथ तैनात था जिनके पुत्र एक प्रतिष्ठित संस्थान से पांच वर्षीय एलएलबी के छात्र थे. एक दिन जब हम उनके बेटे के भविष्य में कैरियर पर चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं उनका बेटा प्रैक्टिस में जाए, ना कि किसी लॉ फर्म में. इसका कारण उन्होंने यह बताया कि यदि उनका बेटा प्रैक्टिस में रहता है तो वे सत्ता के मजबूत लोगों के साथ अपने कांटेक्ट और ताकत से कुछ सालों बाद उसे हाई कोर्ट जज में नियुक्ति अवश्य करवा देंगे. ये आईपीएस अफसर इस बात के लिए पूरी तरह मुतमईन थे कि उनके लड़के का हाई कोर्ट जज बनना तय है क्योंकि उनका यह व्यक्तिगत मत था कि हाई कोर्ट जज में चयन होने के लिए सबसे बड़ी जरुरत सही स्थान पर संपर्कों की है जिनकी उन्हें कोई कमी नहीं है.

एक दुसरे उदाहरण के रूप में दो दिन पहले हमारे घर एक पुराने मित्र आये थे जो एक मध्यम श्रेणी के हिंदी अखबार के प्रकाशक और संपादक हैं. बातचीत के क्रम में उनकी छोटी बेटी के कैरियर की बात होने लगी तो उन्होंने कहा कि वे अपनी बेटी को लॉ पढ़ाएंगे. इसका कारण उन्होंने यह दिया कि चूँकि उनकी बेटी एक मुस्लिम शिया के साथ एक महिला भी है, अतः इन सभी सहायक तत्वों के साथ वे अपने रसूख और अपने तमाम संपर्कों के बल पर उसे आसानी से हाई कोर्ट जज बनवा देंगे.

ये दो उदाहरण इस बात को बताने के लिए पर्याप्त हैं कि न्यायपालिका के भीतर से कोलेजियम सिस्टम में प्रस्तावित परिवर्तन को ले कर चाहे कितना भी विरोध हो, एक औसत व्यक्ति के मन में यही सोच है कि सही संपर्कों के बल पर आसानी से हाई कोर्ट जज का पद पाया जा सकता है. यदि यह भावना बहुत बलवती नहीं होती तो क्या एक आईपीएस अफसर और एक वरिष्ठ पत्रकार इतनी गंभीरता और इतनी सहजता से यह बात कहते? मैं पूरे दावे से कह सकता हूँ कि ये महानुभाव वही बात आईएएस, आईपीएस अथवा आईआईटी और आईआईएम् के लिए नहीं कहते क्योंकि उन्हें भी मन में लगता कि इन जगहों पर वे अपने कथित रसूख और संपर्कों का प्रयोग कर अपने बच्चे को नहीं घुसा सकते हैं.

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, न्याय होते दिखना भी चाहिए. इसी प्रकार उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए भी बहुत ही पारदर्शी व्यवस्था का बनना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है जिसमे हर आदमी यह जान सके कि श्री ए या बी का चयन हाई कोर्ट जज के पद पर क्यों हो गया और श्री सी, डी, ई और अन्य लोग इसके लिए क्यों नहीं उपयुक्त पाए गए. जब तक पारदर्शिता की यह स्थिति नहीं बनेगी, हर दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति यही कहता और सोचता दिखेगा कि यह अपने विधि के छात्र बच्चे को हाई कोर्ट जज बनवायेगा मानो यह पूरे मार्किट में सबसे आसानी से मिल रही नौकरी हो.

Friday, June 20, 2014

Copy of FIR about cheating of Brazilian NRI by UPICO

सेवा में,
प्रभारी निरीक्षक,
थाना काकादेव,
जनपद- कानपुर नगर  

       मैं अमिताभ ठाकुर वर्तमान में आईजी/संयुक्त निदेशक, नागरिक सुरक्षा, उत्तर प्रदेश लखनऊ के पद पर तैनात हूँ और आपके समक्ष उत्तर प्रदेश इंडस्ट्रियल कंसल्टेंट्स लिमिटेड (यूपीको), कानपुर पता 5वां तल, कबीर भवन, जीटी रोड, सर्वोदय नगर, थाना काकादेव, कानपुर- 208002 (फोन नंबर 0512-2216135, 2213596 फैक्स- 0512-2242719, वेबसाइट से जुड़ा एक गंभीर प्रकरण प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मुझे मेरे एक परिचित वर्तमान में ब्राजील में निवास कर रहे श्री अमिताभ रंजन द्वारा अवगत कराया गया.
श्री अमिताभ रंजन ने विभिन्न तिथियों में अपने ईमेल से मुझे मेरे ईमेल पर एक श्री गौरी शंकर प्रकाश पीरुपल्ले (ईमेल से जुड़ा प्रकरण बताया.  श्री गौरी शंकर जमशेदपुर, झारखण्ड से रिटायर हो कर 1978 से ब्राजील में बसे हुए हैं.
इन ईमेल के अनुसार दिसंबर
2008 से अप्रैल 2009 के मध्य यूपीको ने ब्राजील में कुछ कार्यक्रम आयोजित किये. इस कार्यक्रम हेतु पैसा भारत सरकार के कॉमर्स मंत्रालय द्वारा वहां किया जाना था. भारत सरकार के निर्देशों और सहयोग के बल पर यूपीको ने ब्राजील में यह वृहद् कार्यक्रम आयोजित किया जिनमे शोरूम, वेयरहाउस तथा अन्य तमाम खर्चे के लिए यूपीको की ओर से जार्डिम, साओ पाउलो, ब्राजील के निवासी श्री मार्को अंतोनियो टोर्रेस कार्वाल्हो नियत किये गए थे. श्री कार्वाल्हो ने अपने स्तर से यूपीको की जानकारी और सहमति से श्री गौरी शंकर प्रकाश को इस कार्य में अपना सहयोगी बनाया और इस प्रकार श्री प्रकाश और श्री कार्वाल्हो ने मिल कर एक साथ यूपीको के लिए ब्राजील में काम किया और इस अवधि में यूपीको को विभिन्न प्रकार की सुविधा मुहैया कराई और इसमें अपने पैसे खर्च किये.
श्री कार्वाल्हो ने अन्य बातों के अलावा श्री फ्रांसिस्का नेलिडा ओस्त्रोविच्ज़, निवासी अवेनिदा एंजेलिका, ब्राजील के साथ दिनांक
01/02/2008 को श्री ओस्त्रविच्ज़ के मकान का लीज एग्रीमेंट किया. इसके अतिरिक्त इस पूरी अवधि में श्री कार्वाल्हो के कई अन्य खर्चे भी हुए. मुझे जो बिल भेजे गए हैं उनमे दिसंबर 2008 से अप्रैल 2009 के 5 महीने के बिजली, प्राकृतिक गैस, वीआईपी होटल बिल, ऑफिस रेंट, टेलेफोन, इन्टरनेट, पेट्रोल, कार पार्किंग, ऑफिस सामग्री, पार्सल आदि के साथ श्री गौरी शंकर प्रकाश के फीस सम्मिलित हैं. इन बिल के साथ तमाम ऐसी रसीदें संलग्न हैं जो श्री प्रकाश की बात को पुख्ता करती हैं.
श्री कार्वाल्हो और श्री गौरी द्वारा श्री परवेज़ अहमद, तत्कालीन कंसल्टेंट को संयुक्त रूप से भेजा गया पत्र दिनांक
16/04/2009 इस हेतु विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिसमे दोनों ने सामूहिक रूप से अवगत कराया है कि कुल 58,750.76 डॉलर श्री कार्वाल्हो के एकाउंट में ट्रांसफर किया जाना था जिसमे श्री कार्वाल्हो और श्री गौरी शंकर द्वारा परस्पर सहमति से श्री कार्वोल्हा के 16,539.43 डॉलर तथा श्री गौरी शंकर प्रकाश के 42,211.33 डॉलर हैं.
इसके बाद श्री गौरी शंकर ने ना जाने कितनी ही बार यूपीको के अधिकारियों को पत्र और ईमेल द्वारा ब्राजील शोरूम एवं वेयरहाउस पर दिसंबर
2008 से अप्रैल 2009 के बीच किये गए उनके खर्च के विषय में अवगत कराया पर यूपीको ने तब से अब तक श्री गौरी शंकर के पैसे देने से मना किया है, जबकि तथ्यात्मक स्थिति यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए कॉमर्स मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा काफी पहले ही आवश्यक फंड रिलीज़ हो चुका है. श्री गौरी शंकर बार-बार यह लिख रहे हैं कि उन्होंने अपने जेब से पैसे खर्च किये थे, ब्राजील में उन्हें इसके लिए काफी ब्याज दर देना पड़ रहा है लेकिन यूपीको इसे पूरी तरह नज़रंदाज़ कर रहा है.
श्री गौरी शंकर का कहना है कि फ़रवरी
2009 में यूपीको के पूर्व एमडी श्री ए के भटनागर (फोन नंबर 09873187789) की जगह श्री विक्रम हंस नए सीएमडी बने और उनके आश्वासन पर भी श्री गौरी शंकर ने बदस्तूर अप्रैल तक अपना काम जारी रखा था. श्री गौरी शंकर ने अपने इन ईमेल में कहा कि श्री विक्रम हंस ने उन्हें वादा किया था कि जुलाई 2009 तक प्रत्येक दशा में उनका पैसा मिल जायेगा. इसके बाद श्री गौरी शंकर लगातार ईमेल और श्री विक्रम हंस के फोन नंबर 09984296555 पर संपर्क करते रहे पर उन्हें अपना पैसा आज तक नहीं मिला जबकि कॉमर्स मंत्रालय ने  जुलाई 2009 में ही ब्राजील प्रोजेक्ट की धनराशि रिलीज़ कर दी थी.  
मैंने इस सम्बन्ध में श्री विक्रम हंस, पूर्व सीएमडी और श्री प्रवीण सिंह, वर्तमान सीएमडी से भी बात की लेकिन उससे कोई नतीजा नहीं निकला. उन दोनों ने कहा कि श्री गौरी शंकर का दावा झूठा और गलत है और उसमे कोई दम नहीं है. उन्होंने कहा कि ब्राजील प्रोजेक्ट के लिए प्राप्त पूरी धनराशि का ऐडजस्टमेंट हो गया है और अब इसमें कोई बात शेष नहीं है. उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में उनके रिकार्ड्स में श्री गौरी शंकर प्रकाश का कोई भी क्लेम नहीं है और इस प्रकार उनके क्लेम के सम्बन्ध में अब कोई भी चर्चा बेमानी है. उन दोनों की बात से ऐसा लग रहा था कि वे अब इस मुद्दे को पूरी तरह भूल जाना चाहते हैं.
इसके विपरीत श्री ए के भटनागर, पूर्व सीएमडी यूपीको, जिनके समय इस प्रकरण की शुरुवात हुई, ने मुझसे अपनी बातचीत में स्पष्टतया स्वीकार किया कि श्री गौरी शंकर के साथ ठगी की जा रही है, उन्होंने यूपीको के साथ काम किया था, उनका यूपीको पर पैसा बकाया है पर यूपीको उनका पैसा नहीं दे रहा. श्री भटनागर के अनुसार इसके मुख्य बात यह है कि यूपीको को कॉमर्स मंत्रालय से पैसा मिल गया है पर उन्होंने इसे गलत ढंग से इधर-उधर फर्जी खर्चा दिखा कर श्री गौरी शंकर के जायज खर्चे को देने से मना कर रहे हैं. श्री भटनागर ने मुझे बताया कि यूपीको के पूर्व सीएमडी श्री विक्रम हंस सहित कुछ सम्बंधित अधिकारियों ने मिल कर अपना बैलेंस शीट अपनी मर्जी से गलत-सही बना लिया और श्री गौरी शंकर को पैसा नहीं दिया. उन्होंने बताया कि इस मामले में यूपीको द्वारा फर्जी दस्तावेज़ बनाए गए हैं और इनके आधार पर श्री गौरी शंकर के वाजिब हक़ को दरकिनार किया जा रहा है.
श्री भटनागर ने मुझे इस सम्बन्ध में अपने ईमेल से भेजे कई मेल भी भेजे. इनमे दिनांक 08/08/2009  को श्री विक्रम हंस को भेजे मेल में यह बात स्पष्ट रूप से कहा. साथ ही इसमें अपने पूर्व ईमेल दिनांक 05/08/2009 में भी उन्होंने यह बात कही थी और यह भी बताया था कि इस हेतु सरकारी ग्रांट मिल चुका है. श्री भटनागर ने पुनः अपने मेल दिनांक 13/08/2009 द्वारा यह बात दुहराई थी. उन्होंने साफ़ कहा था कि यदि श्री गौरी शंकर प्रकाश का वाजिब बकाया नहीं दिया गया तो इसके लिए यूपीको जिम्मेदार होगा.
इसके अतिरिक्त श्री गौरी शंकर के ईमेल दिनांक 28/09/2009, 01/10/2009, 04/02/2011 की प्रति मेरे पास है जिनमे उनके द्वारा बार-बार कहा कि श्री विक्रम हंस से फोन नंबर 09984296555 पर बात करने और उनके व्यक्तिगत आश्वासन और के बाद भी उन्हें आज तक अपना पैसा नहीं मिला है. उन्होंने इन मेल में अपने R$ 42.211,33 + R$ 9.280,20 अर्थात R$ 51491,53 { बिना ब्याज } = 30289,14 यूएस डॉलर बकाये की मांग की है.
हाल में श्री अमिताभ रंजन के मेरे संपर्क में आने के बाद और मेरे द्वारा श्री गौरी शंकर प्रकाश की मदद करने का आश्वासन देने के बाद श्री गौरी शंकर ने अपने ईमेल दिनांक 14/06/2014 द्वारा मुझे इस सम्बन्ध में अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु अधिकृत किया जिसके बाद मैं श्री गौरी शंकर के प्रकाश के R$ 51491,53 { बिना ब्याज } = 30289,14 यूएस डॉलर (जो वर्तमान डॉलर रुपये समतुल्य के अनुसार आज की तिथि को 18.25 लाख रुपये हुए) यूपीको के विभिन्न अधिकारियों द्वारा भारत सरकार से धन प्राप्त हो जाने के बाद भी छलपूर्वक हथिया लेने, इस हेतु अपने एकाउंट बुक में गलत खाता-बही का सृजन करने, कूटरचना, मिथ्या दस्तावेज़ की रचना करने और इस प्रकार सरकारी धन का गबन कर लेने के गंभीर अपराध के सम्बन्ध में यह प्रार्थनापत्र आपके सम्मुख एफआइआर दर्ज किये जाने हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि श्री गौरी शंकर प्रकाश जैसे एक वरिष्ठ नागरिक, जिन्होंने देश सेवा के जज्बे से ब्राजील में अपना खर्च कर ब्राजील प्रोजेक्ट में अपना पैसा और समय खर्च कर योगदान किया और इसके बदले उन्हें यूपीको, कानपुर के कुछ अधिकारियों द्वारा यूपीको, कानपुर में धोखा मिला, उनके साथ न्याय हो सके और इस मामले में अब तक जो गलत सन्देश जा रहा है उसका समापन हो सके.
निवेदन करूँगा कि श्री गौरी शंकर प्रकाश की ओर से समस्त तथ्य प्रस्तुत करने हेतु मैं निरंतर आपकी सेवा में उपस्थित रहूँगा.

पत्र संख्या-
AT/Brasil/01                                        भवदीय,
                                                              (अमिताभ ठाकुर )
      5/426, विराम खंड,
                                                            गोमती नगर, लखनऊ

                                                                                                                                                                    # 94155-34526
प्रतिलिपि- वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, कानपुर नगर को कृपया अपने स्तर से भी प्रभारी निरीक्षक, काकादेव को प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु आदेशित करने के लिए